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शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

२६/११ मुंबई

"वो ख्वाब था जो बिखर गया यूँ" उस शाम न जाने  कितनी माओं के ख्वाब टूट गये, जो घर पर बेटों का इन्तजार  करतीं रहीं, उस शाम जवानों का जोश रास्तों पर लहू बन बह रहा था.
आखिर  क्यों हर भीषण तबाही के बाद ही सजग होने की कोशिश की जाती है? सिद्ध हो गया की हम देश से पहले हैं. नहीं तो सीमा पर सजग रहने वाले सिपाही भी दुश्मन को पहचान नहीं पाए यह तो नहीं होना चाहिए.....कोई तो बात रही होगी जो मछुआरों के  जानकारी देने के बाद भी हमारे प्रहरी आने वाली उस विभीषिका की पदचाप  भी न सुन सके जिसकी गूँज न जाने कितनी सदियों सुनाई देगी.....

4 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सच में संगीताजी.... वो दिन पूरे देश के लिए दुखद घटना है......

विनम्र श्रद्धांजलि.....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सार्थक चिंतन करती संवेदनशील पोस्ट

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

संवेदनशील पोस्ट

Rohitas ghorela ने कहा…

सच में वो एक एक पल भरी और दुखद था |

संगीता जी आपका मेरे ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है



http://rohitasghorela.blogspot.com


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