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बुधवार, 30 नवंबर 2011

रिश्तों की महक

रिश्तों के बारे में जब भी सोचते हैं यादों की सुनहरी झलकियाँ मानस पटल पर उभर आती हैं, ऐसा तभी होता है जब रिश्तों को जिया जाता हो सिर्फ निभाया नहीं जाता हो...हमारे दुखों का कारण साधनों की कमी नहीं है दुखों का कारण रिश्तों को न समझना है.....आज हर इन्सानकिसी न किसी कारण से अवसाद ग्रस्त है क्योंकि हम अपनी   जिजीविषा  खत्म करते जा रहे हैं ,हमारे जीवन की आतंरिक बनावट  अब ऊचाई मापक हो गयी है, हम सिर्फ अनुसन्धान करने लगे हैं, जीवंत हो हर पल अतः  जीवन मूल्यों को पुनः निर्धारित करना ,तथा उन्हें नूतनता ,कमनीयता प्रदान करनी होगी ,औरों से,
अपेक्षा न रख अपना मूल्यांकन करें की हमारे करने के लिए क्या है ?जितना ऊंचा उठेंगे उतने एकाकी होते जायेंगे उंचाई के साथ-साथ विस्तार भी जरूरी है किसी को साथ लें या किसी के संग  चलें. संवेदनशीलता साथसाथ  सपनों  के संसार को भी मूर्त रूप  दें .
        अनुसन्धानकरते हुए मानव धर्मं की अनुभूती भी करें और फिर रिश्तों की महक में खो जाएँ........................ 

3 टिप्‍पणियां:

Rakesh Kumar ने कहा…

रिश्तों की महक.. वाह क्या बात है.
सुन्दर प्रयास किया है आपने.
आपकी सोच सकारात्मक है.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,संगीता जी.
आने जाने से ही जानकारी होती है.

shilpa mehta ने कहा…

संगीता जी - हम कितनी ऊंचाई पर भी जाएँ - तो अकेले नहीं, अपने आस पास के प्रियजनों को साथ ले कर आगे बढें, तो जिजीविषा कम नहीं होगी, बल्कि बढती जायेगी |

प्रेम जीवन का पोषण करता है - उसे बनाये रखना ही जीवन को अर्थ देता है |

:)

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

आभार सहमत हूँ आपसे....

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