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बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

मैं और खुदा

              खुदा और मेरे बीच इतना फासला क्यूँ है ;
              उम्र भर अश्क पीने की ये सजा क्यूँ है ??
        
              लहरों की हलचल में छिपा है दरिया का दर्द 
               हर लहर से पूछ साहिल से पूछ आबे-खां  से पूछ ::::::::::::::
                बार-बार बात-बात पर मुझे झकझोरता क्यूँ हैं ?

                चलने का हौसला ही नहीं है तो दूरी का ग़म सताता है  ;
                   कदम दर कदम मंजिल का पता पूछता क्यूँ है ?

                  महफूज था दर्द मेरे सीने में जो गुजर गया सो गुजर गया ;
                   फिर उसकी याद रह-रह कर दिलाता क्यूँ है ?
                          
                           

10 टिप्‍पणियां:

सदा ने कहा…

वाह ... बेहतरीन

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर भावप्रणव प्रस्तुति...!

सतीश सक्सेना ने कहा…

यादें नहीं जातीं ....
शुभकामनायें !

Kailash Sharma ने कहा…

महफूज था दर्द मेरे सीने में जो गुजर गया सो गुजर गया ;
फिर उसकी याद रह-रह कर दिलाता क्यूँ है ?

....यादें कहाँ साथ छोडती हैं...बहुत सुन्दर भावमयी प्रस्तुति..

धीरेन्द्र अस्थाना ने कहा…

दिल को छूने वाली गजल !

केवल राम : ने कहा…

भावपूर्ण रचना ....मेरे ब्लॉग पर आकर उत्साहपूर्ण टिप्पणी के लिए आपका धन्यवाद ....!

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

खुदा और मेरे बीच इतना फासला क्यूँ है ;
उम्र भर अश्क पीने की ये सजा क्यूँ है ??
भावपूर्ण....बेहतरीन पंक्तियाँ

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत शानदार ग़ज़ल शानदार भावसंयोजन हर शेर बढ़िया है आपको बहुत बधाई...कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब,बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

lamhe ने कहा…

touching lines

tbsingh ने कहा…

चलने का हौसला ही नहीं है तो दूरी का ग़म सताता है ;
sunder prastuti.

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