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शनिवार, 29 सितंबर 2012

बीते लम्हों को याद कर फिर मुस्कुराने की कोशिश कर रही हूँ ,
कि अपने दामन में फिर सितारे समेटने की कोशिश कर रही हूँ ,

किसी अपने के खो जाने से यह दुनिया नहीं रुका करती है ,
यही अपने दिल को समझाने की कोशिश कर रही हूँ ,

घर के तमाम कोनों  में बिखरा पड़ा है वजूद उसका ,
फिर भी जाने कहाँ-कहाँ ढूंढने की कोशिश किये जा रही हूँ ,

हर रहगुजर ,हर मोड़ पर मानो मुस्कुराता हुआ मिल जाएगा वो ,
बार-बार उसे पुकारती गुजरती जा रही हूँ ,

माँ की आँख का तारा था वो मेरे सूत से बंधा था वो ,
जाने कैसे गाँठ खुल गई कि  आज तक नहीं समझ पा रही हूँ में,


बीते लम्हों को याद कर फिर मुस्कुराने की कोशिश कर रही हूँ ,
कि अपने दामन में फिर सितारे समेटने की कोशिश कर रही हूँ ,

7 टिप्‍पणियां:

ऋता शेखर मधु ने कहा…

संगीता जी, बहुत दुखी कर रही है यह रचना...आपका दर्द समझ सकती हूँ...ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें और आपको हिम्मत दें|

pinki vaid ने कहा…

jo humse dur chala gaya,mana ki wo kbhi na ayega pr
hum sada uski yadon ko sahej kar rakhenge

pinki vaid ने कहा…

दुःख का दरिया पर कर तुम हिम्मत से बiहर आ जाओ . इंतजार है ..........

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत मार्मिक...

Maheshwari kaneri ने कहा…

हर सुबह शाम में ढल जाता है
हर तिमिर धूप में गल जाता है
ए मन हिम्मत न हार
वक्त कैसा भी हो
बदल जाता है ….

S.N SHUKLA ने कहा…

सुन्दर सृजन ,आभार .

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारकर अपना स्नेह प्रदान करें.

सतीश सक्सेना ने कहा…

बचपन से,ही रहा खोजता
ऐसे , निर्मम, साईं को !
काश कहीं मिल जाएँ मुझे
मैं करूँ निरुत्तर,माधव को !
अब न कोई वरदान चाहिए,सिर्फ शिकायत मेरे मीत !
विश्व नियंता के दरवाजे , कभी ना जाएँ , मेरे गीत ! १

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