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शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2012

हाँ भोर हो गई

         क्षितिज के झरोंखो से किरणों के  झांकते ही फज़ा रोशन हुई ,
             रास्ते  मुस्कुराने लगे  ,रवि  ने समेट  ली  नर्म कोहरे  की चादर ,
         दरख्तों के जवां हौसले बुलंद होने को हैं ;
         पक्षियों के गीत आँगन मे गूंजने लगे 
         रहत की रहस्यमय  चरमराहट से खेत भी गुनगुनाते है ;
          ओस का आँचल ढलका रोशनी के हजार दिए खिलखिला उठे ;
                        हाँ भोर हो गई  : लो भोर हो गई                      

8 टिप्‍पणियां:

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

स्वागत है आपकी इस नई भोर का .....

ऋता शेखर मधु ने कहा…

स्वागत करें रौशनी के हजार दिए का मुस्कुराकर...
शुभकामनाएँ!!
मैं इस ब्लॉग की फोलोअर हूँ
पर मेरे डैशबोर्ड पर आपकी पोस्ट नहीं दिख रही?
लगता है इसी कारण पिछले पोस्ट नहीं देख पाई|

pinki vaid ने कहा…

रौशनी से नहाई धरा ले चली आशा की उडान पर

रचना दीक्षित ने कहा…

ओस का आँचल ढलका रोशनी के हजार दिए खिलखिला उठे ;
हाँ भोर हो गई : लो भोर हो गई.

भोर का बहुत सुंदर दृश्य खींचा है. अदभुत प्रस्तुति.

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

एक सुन्दर नज़्म....

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

एक सुन्दर नज़्म....

lamhe ने कहा…

you are special in your style

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको

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