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रविवार, 21 अक्तूबर 2012

विविधा के साथ "जिंदगी का सफ़र "

जिंदगी की हर अदा से यूँ तो मैं वाकिफ नहीं हूँ ;फिर भी जिंदगी मुझसे और में जिंदगी से अजनबी नहीं हूँ::::::::

इस सफ़र के मीलों फासले तय कर लिए मैंने ;जिंदगी हासिल हो जहाँ वो मुकाम हासिल नहीं हैं ;
"मैं और तुम में" हमने बाँट लिया इसे ;मगर जिंदगी ने इसे कभी कबूला ही नहीं है :::::::::::::::::::::::;

                                 इसने दुनिया के तजर्बों की शक्ल में जो भी दिया है ,मुझे;
                                  उसमें उम्मीदों की झलक ख़्वाबों की शहनाई भी है ;
                                 बोझल से मुस्तकबिल की रोशनी भी है ;
                                  कबूला है मैंने हर शक्ल में इसे ,पर लौटाया कुछ भी नहीं है ::::::::::::::::::
                                   

                                  तमाम उम्र वो राहें मेरे ज़ेहन  में घुमती रहेंगी ;
                                  जिन राहों से मायूसी से तो कभी उम्मीदों से गुजर की है;
                                  अपनी खुशियों को और अपने ग़मों को तक़दीर से बाँध रक्खा है ;
                                  मानो कभी जिंदगी के फ़लसफ़े को समझा ही नहीं है::::::::::::::::::::::::::::

जिंदगी की हर अदा से यूँ तो में वाकिफ नहीं हूँ ;फिर भी जिदगी मुझसे और में जिन्दगी मुझसे अजनबी नहीं हूँ
                                                                                                                   "संगीता "

3 टिप्‍पणियां:

धीरेन्द्र अस्थाना ने कहा…

संगीता दी !
ये जिन्दगी ऐसी ही है !


यूँ तो जख्मी सारा जहाँ ही था,
जीने को जमीं न आसमाँ ही था;
फिर भी चलती ही जा रही जिन्दगी!
कभी एक पहेली- कभी एक सवाल है
फलसफा कभी, दर्शन तो कभी वबाल है!
सबको उलझाती जा रही है जिन्दगी !

सतीश सक्सेना ने कहा…

@कबूला है मैंने हर शक्ल में इसे ,पर लौटाया कुछ भी नहीं है...

बधाई आपको !

lamhe ने कहा…

kisi ko mukkammal jahaan nahin milta.
just live to the full

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