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मंगलवार, 13 मार्च 2012

दायरा

दर्द की हर परिधि के पार जाना चाहती हूँ ,
हर झूठी संवेदना से दूर जाना चाहती हूँ ,
चाहती हूँ तैर जाना जीवन की इस अम्बुधि में ,
किसी व्यथा से अब नहीं  व्यथित होना चाहती हूँ ...
नींद सुख की एक ही सही पर कुछ विश्राम चाहती हूँ...
अन्धकार उर में समेटे जीवन की इस पगडण्डी पर ,
कुछ उजले स्वप्नों से तिमिर को भी हर सकूं मैं,
कोई स्वप्न फिर न छला जाये ;संग कोई चले ,
अब असीमित आकाश में प्राणों के पंख तौलना चाहती हूँ .
जीवन की अंतिम दस्तक पर मृत्यु का यशगान करूँ जब,
 गूंज उठे फिर मुक्ति गीत ,और सृजन की तैयारी हो ,
अमर  ध्येय हो सबका जग में; सफल मनोरथ हों मानस के ,
अपने आराधन से वर में जीवन यज्ञ की शत शत आहुति में ,
तूफानों को मुस्कानों में ;वीरानों को उद्यानों में ,
अपमानों को सम्मानों में ,परिणित कर हँसते -हँसते,
जीवन की इस अम्बुधि से होम करना चाहती हूँ .  
 
 
   

23 टिप्‍पणियां:

expression ने कहा…

कोई स्वप्न फिर न छला जाये ;संग कोई न चले ,
अब असीमित आकाश में प्राणों के पंख तौलना चाहती हूँ ...

अदभुद!!!!

बहुत सुन्दर कृति संगीता जी.
सादर.

रविकर ने कहा…

उदासीनता की तरफ, बढे जा रहे पैर ।
रोको रोको रोक लो, करे खुदाई खैर ।

करे खुदाई खैर, लगो योगी वैरागी ।
दुनिया से क्या वैर, भावना क्यूँकर जागी ।

दर्द हार गम जीत, व्यथा छल आंसू हाँसी ।
जीवन के सब तत्व, जियो तुम छोड़ उदासी ।।


दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक
dineshkidillagi.blogspot.com

Rajesh Kumari ने कहा…

sundar prastuti.

ऋता शेखर मधु ने कहा…

दर्द की हर परिधि के पार जाना चाहती हूँ ,
हर झूठी संवेदना से दूर जाना चाहती हूँ ,

हम आएँ हैं दुनिया में तो जीना ही पड़ेगा
जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा
...खुश रहने का प्रयास जरूरी है

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी रचना। बधाई।

dheerendra ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति,सुंदर रचना बधाई

RESENT POST...काव्यान्जलि ...: तब मधुशाला हम जाते है,...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

कोई स्वप्न फिर न छला जाये ;संग कोई न चले ,
अब असीमित आकाश में प्राणों के पंख तौलना चाहती हूँ ...


Bahut hi Sunder....

Sadhana Vaid ने कहा…

तूफानों को मुस्कानों में ;वीरानों को उद्यानों में ,
अपमानों को सम्मानों में ,परिणित कर हँसते -हँसते,
जीवन की इस अम्बुधि से होम करना चाहती हूँ .

आपकी इस शुभाशंसा में मेरे स्वर भी सम्मिलित हैं संगीता ! बहुत सुन्दर रचना है ! बधाई एवं मंगलकामनाएं !

रविकर ने कहा…

सजी मँच पे चरफरी, चटक स्वाद की चाट |
चटकारे ले लो तनिक, रविकर जोहे बाट ||

बुधवारीय चर्चा-मँच
charchamanch.blogspot.com

ASHOK BIRLA ने कहा…

awsam ..mem out of limit ....!!

Kirti Kumar Gautam ने कहा…

अच्छा ओर बहुत अच्छा

मनीष सिंह निराला ने कहा…

दर्द की हर परिधि के पार जाना चाहती हूँ ,
हर झूठी संवेदना से दूर जाना चाहती हूँ ,
सुन्दर प्रस्तुति !
आभार !

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना शेयर करने के लिये बहुत बहुत आभार,
" सवाई सिंह "

Devendra Gautam ने कहा…

जीवन की अंतिम दस्तक पर मृत्यु का यशगान करूँ जब,
गूंज उठे फिर मुक्ति गीत ,और सृजन की तैयारी हो ,

वाह! कितना बड़ा दर्शन समाहित है सिर्फ इन दो पंक्तियों में. अद्भुत...

Ruchi Jain ने कहा…

bhut hi gehra soch hai apke..

dinesh aggarwal ने कहा…

बेहतरीन भावपूर्ण अभिव्यक्ति..

avanti singh ने कहा…

सुंदर रचना बधाई ....

Kailash Sharma ने कहा…

चाहती हूँ तैर जाना जीवन की इस अम्बुधि में ,
किसी व्यथा से अब नहीं व्यथित होना चाहती हूँ ...
नींद सुख की एक ही सही पर कुछ विश्राम चाहती हूँ...

बहुत खूब! बहुत गहन और भावपूर्ण रचना....

lamhe ने कहा…

so full of positive energy and hopes.

mridula pradhan ने कहा…

bahut saral aur sunder rachna.....

amrendra "amar" ने कहा…

बहुत अच्छी रचना।

सदा ने कहा…

अपमानों को सम्मानों में ,परिणित कर हँसते -हँसते,
जीवन की इस अम्बुधि से होम करना चाहती हूँ .
वाह ...बहुत ही बढिया।

कविता रावत ने कहा…

किसी व्यथा से अब नहीं व्यथित होना चाहती हूँ ...
नींद सुख की एक ही सही पर कुछ विश्राम चाहती हूँ..
..thak haar kar man sach kitna bojhil lagta hai... lekin khushi ki ek kiran kitna ujala kar jaati hai... shayad yahi jindagi ka falsafa hai..
bahut sundar sarthal chintan karati rachna

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