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मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

बस यूँ ही

न अपनाया मैंने न जमाने ने मेरा चलन
यूँ ही गुजर गयी साथ-साथ चलते हुए
हमने गुजारी है हम ही जानते हैं कैसे!
तुम भी गुजार दो यूँ ही साथ-साथ चलते हुए

      सुनते हैं की अबकी हवा कुछ गरम है उधर की
दहशत भी समाई है , संगीनों के साये भी हैं
छिप गया आफ़ताब भी वहशत के अंधियारों में
 नजरें भी हैं  इस तरफ कुछ सियासतदानों की

  गम का सफ़र अकेले यूँ गुजारा  नजाएगा,
 काँटों  की चुभन हो,तपिश तेरी बेवफाई की हों साथ
रुस्वाइयाँ हों मेरे सजदों की,ख़्वाबों की चुभन का हो एहसास
हमने तो निबाह लिया इस जिन्दगी के साथ,
 किसी और से तो निभाया न जाएगा

  हर आंसू कुछ कहता है अगर समझ सको तो
ख़ुशी में राहत का एहसास कराता,गम में हर पल साथ निभाता
 यूँ ही न बहाओ कुछ जतन करो इनका
पलकों में ही बसर करने दो दामन में सहेज रखो
जब कहीं कोई नहीं होता तब यही तुम्हें बहलाता है
हर आंसू कुछ कहता है गर समझ सको

                     
            

12 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

हर आंसू कुछ कहता है अगर समझ सको तो
ख़ुशी में राहत का एहसास कराता,गम में हर पल साथ निभाता

सच है.... बहुत गहरी बात कही आपने ....

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

वाह! बहुत खूब, सुंदर रचना।

Sadhana Vaid ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना संगीता ! देर से आ पाई इसका अफ़सोस है ! बहुत अच्छा लिखा है !

आशु ने कहा…

संगीता जी,

बहुत सुन्दर रचना ...
"गम का सफ़र अकेले यूँ गुजारा नजाएगा,
काँटों की चुभन हो,
तपिश तेरी बेवफाई की हों साथ
रुस्वाइयाँ हों मेरे सजदों की,
ख़्वाबों की चुभन का हो एहसास
हमने तो निबाह लिया इस जिन्दगी के साथ,
किसी और से तो निभाया न जाएगा"

सच ही तो है..कितना मुश्किल है ...गमों के सफर को यूं अकेले गुजारना कोई आसान बात थोड़े ही है..
अति सुन्दर भाव पूर्ण रचना के लिए बधाई!!

मनीष सिंह निराला ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना ...!
आभार !
मेरे ब्लॉग पे आपका हार्दिक स्वागत है ..!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

हर आंसू की अपनी एक दास्तान ... वही सुनता है जो कभी रोया हो फूट फूटकर

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

ईतनी हिम्मत भी हार किसी में नहीं होती।

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

आँसूँ यूँ ही नहीं निकलते...खुशी या गम की एक कथा समेटते हैं ये...

संजय भास्कर ने कहा…

हमने तो निबाह लिया इस जिन्दगी के साथ,
किसी और से तो निभाया न जाएगा
बहुत सही लिखा है ...बहुत बहुत बधाई|

संजय भास्कर
आदत...मुस्कुराने की
http://sanjaybhaskar.blogspot.com/

***Punam*** ने कहा…

यूँ ही न बहाओ कुछ जतन करो इनका
पलकों में ही बसर करने दो दामन में सहेज रखो

vyarth n jaye ye aansoo....!!

prritiy---------sneh ने कहा…

bahut hi achhi rachna.
lohri avum makarsankranti ki shubhkamnayen.

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