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गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

समय का मरहम

कहते हैं कि वक्त हर जख्म का इलाज होता है पर मैंने तो यही महसूस किया है कि वक्त सभी घावों को सहेजता है ,कि आने वाला समय इन वेदनाओं को याद कर हम सहने के आदि हो जाएँ । यही कुछ आज की स्थितियां बयां करती नजर आ रही हैं । लोकपाल का बदला हुआ स्वरूप उस शख्सियत के समर्थन को हासिल करने में कामयाब हो गया जो उसके खिलाफ था । क्या ये वक्त के तकाजे हैं या कोई मजबूरी ?
              आने वाले समय में क्या  बीता हुआ  जायेगा ,जिससे गरीबों को और गरीबी का अहसास कराया जायेगा ,कि तुम एक रुपए किलो का चांवल, मटर की दाल  की पात्रता रखते हो या मुफ्त में दिया जायेगा ।
                इससे तो अच्छा होता कि उन्हें काम मुहैया कराया जाता और सस्ते में राशन उपलब्ध कराया जाता जिससे कि वे भी स्वाभिमान के साथ जिये न कि सरकार कि कृपाओं पर ।  
 

मंगलवार, 12 मार्च 2013

जिंदगी भी बाकी न रही

वो शोखियों में लिपटी मुस्कान न रही ,
तबस्सुम में भी दिलकशी बाकी न रही .............
सीने से लगाये हूँ उम्मीदों की तलाश ,
कि खामोशियों में भी अब बैचेनी न रही ;;;;;;;;;;;;;
माना की जिंदगी ही तगाफुल ही रही मुझसे हमेशा ,,
कंधों पर सजाती रही है बारे-मसाइब (मुसीबते) हमेशा
 क्यूँ खोजती हूँ नए तर्ज के नए  गीत हमेशा ;;;;;;;;;
जब मेरी जीस्त के मुकद्दर में ही रोशनी न रही ::::::::::::::::;
अब भी जमाने की तल्खियों ने पुकारा है मुझे ,
जलती हुई  राहों पर सिसकती हुई रूहों ने पुकारा है मुझे ,,,,,,,
जाता हुआ वक्त भी दिखाई देता है ,कुछ साए भी नजर आते हैं ;;;;;;;;;
उम्र भर रेंगते रहने की सजा सुनाई है मुझे ;;;;;;;;;;;;;
कुछ भी तो न रहा अब जिंदगी भी बाकी न रही::::::::::::::::::::
वो शोखियों में लिपटी मुस्कान न रही 

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

दुआओं से दामन तेरा आबाद होगा अब भी ,
रहगुजर पर टिकी होगी खामोश नजर तेरी अब भी ,
आसमां से टूटे तारों से आज भी मेरी खैरियत ही चाही होगी ,
तभी तो मैं हालत-ऐ -जुल्मत में रोशनी की तरह आबाद हूँ ,
तू मेरी माँ है ,जिसके मुकददर की इबारत हूँ में अब भी :::::
रात की सतह पर उभरे हुए तेरे चेहरे पर सादा सी नजर ,
आज भी मेरी आरजुओं के एवान सजाती है ,
चंद घडियों के लिए ही सही मेरी इबादत असर ले आये तो सही,
कि, खुदा बक्श दे मेरी माँ मुझे पल भर के लिए ही सही ,
तेरी जागी हुई रातों का सिला दे दूँ मैं तुझे ,
रूहे तक्सीदो वफा (पवित्र आत्मा) तेरे सजदों में झुका है मेरा वजूद तमाम अब भी .........
संगीता

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

कोशिश

आज फिर हसरतों ने दिल में समाने की कोशिश की है :::::::
आज फिर पीर ने सागर सी गहरे में उतर जाने की कोशिश की है,
लहरों की मानिंद चाहतों ने परेशां कर रक्खा है ::::::::::::::::
की डूबे हुए साहिलों पर ठहरने की कोशिश की है::::::::::::::

अब भी जिन्दा हैं मेरी पलकों की गलियों में यादों के कुछ हंसीं मंजर,
अब भी अंगड़ाई लेते हुए ख़्वाब गाहे-बगाहे चले आते हैं ::::::::::::::::::::::
अब भी सुकून तलाशते हुए खो जाती हूँ उस रह्गुजर में ::::::::::::::::::
कि जिन्दा होने की तस्कीन कर लेने की कोशिश की है:::::::::::::::::::::::

 बार-बार गर्दन झुकाई है, बार-बार तलाशा है वो चेहरा दिल के आईने में::::::::::::::
आसमां के सितारों को अब भी कई रातों जाग-जाग कर गिना है मेंने ::::::::
फिर से अश्कों को अपने दामन में समेटा है मैंने :::::::::::::::::::::
आज फिर मुस्कानों से जख्मों को सीने की कोशिश की है ::::::::::::::::::::::::::::::::

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

त्रासदी आजादी की

                                      

  • गहन वेदना त्याग तपस्या एवम अनगिनत आहुतियों पश्चात् आजादी का जन्म हुआ,, 
  • जयघोष का आल्हादित और प्रफुल्लित नारों से आसमान गूंज उठा , 
  • आज उम्र है पैंसठ की और गाथा क्या कहूँ, 
  •  अनुभवों की झुर्रियों में छिपी है छले जाने की पीड़ा,
  •      रोज सुबह का सूरज मेरे सोये मन में नई आशा जगा जाता है ,
  •      पंछी के कलरव गीत नए बन जाते हैं ,पर .......
  •  
  • भूखा बचपन, बिकती कन्या ,और सिसकती तरुणाई है  ,
  • ये कैसी है नई सुबह, और ये कैसी संचार है :::::::::
  •  
  •        वर्तमान के विकट  स्वरूप में दुराचार की आंधी है,,
  •        शास्वत मूल्यों की तिलांजलि है , नेताओं की चांदी है:::::::::
  •  

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

हाँ भोर हो गई

         क्षितिज के झरोंखो से किरणों के  झांकते ही फज़ा रोशन हुई ,
             रास्ते  मुस्कुराने लगे  ,रवि  ने समेट  ली  नर्म कोहरे  की चादर ,
         दरख्तों के जवां हौसले बुलंद होने को हैं ;
         पक्षियों के गीत आँगन मे गूंजने लगे 
         रहत की रहस्यमय  चरमराहट से खेत भी गुनगुनाते है ;
          ओस का आँचल ढलका रोशनी के हजार दिए खिलखिला उठे ;
                        हाँ भोर हो गई  : लो भोर हो गई                      

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

विविधा के साथ "जिंदगी का सफ़र "

जिंदगी की हर अदा से यूँ तो मैं वाकिफ नहीं हूँ ;फिर भी जिंदगी मुझसे और में जिंदगी से अजनबी नहीं हूँ::::::::

इस सफ़र के मीलों फासले तय कर लिए मैंने ;जिंदगी हासिल हो जहाँ वो मुकाम हासिल नहीं हैं ;
"मैं और तुम में" हमने बाँट लिया इसे ;मगर जिंदगी ने इसे कभी कबूला ही नहीं है :::::::::::::::::::::::;

                                 इसने दुनिया के तजर्बों की शक्ल में जो भी दिया है ,मुझे;
                                  उसमें उम्मीदों की झलक ख़्वाबों की शहनाई भी है ;
                                 बोझल से मुस्तकबिल की रोशनी भी है ;
                                  कबूला है मैंने हर शक्ल में इसे ,पर लौटाया कुछ भी नहीं है ::::::::::::::::::
                                   

                                  तमाम उम्र वो राहें मेरे ज़ेहन  में घुमती रहेंगी ;
                                  जिन राहों से मायूसी से तो कभी उम्मीदों से गुजर की है;
                                  अपनी खुशियों को और अपने ग़मों को तक़दीर से बाँध रक्खा है ;
                                  मानो कभी जिंदगी के फ़लसफ़े को समझा ही नहीं है::::::::::::::::::::::::::::

जिंदगी की हर अदा से यूँ तो में वाकिफ नहीं हूँ ;फिर भी जिदगी मुझसे और में जिन्दगी मुझसे अजनबी नहीं हूँ
                                                                                                                   "संगीता "

बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

मैं और खुदा

              खुदा और मेरे बीच इतना फासला क्यूँ है ;
              उम्र भर अश्क पीने की ये सजा क्यूँ है ??
        
              लहरों की हलचल में छिपा है दरिया का दर्द 
               हर लहर से पूछ साहिल से पूछ आबे-खां  से पूछ ::::::::::::::
                बार-बार बात-बात पर मुझे झकझोरता क्यूँ हैं ?

                चलने का हौसला ही नहीं है तो दूरी का ग़म सताता है  ;
                   कदम दर कदम मंजिल का पता पूछता क्यूँ है ?

                  महफूज था दर्द मेरे सीने में जो गुजर गया सो गुजर गया ;
                   फिर उसकी याद रह-रह कर दिलाता क्यूँ है ?
                          
                           

शनिवार, 29 सितंबर 2012

बीते लम्हों को याद कर फिर मुस्कुराने की कोशिश कर रही हूँ ,
कि अपने दामन में फिर सितारे समेटने की कोशिश कर रही हूँ ,

किसी अपने के खो जाने से यह दुनिया नहीं रुका करती है ,
यही अपने दिल को समझाने की कोशिश कर रही हूँ ,

घर के तमाम कोनों  में बिखरा पड़ा है वजूद उसका ,
फिर भी जाने कहाँ-कहाँ ढूंढने की कोशिश किये जा रही हूँ ,

हर रहगुजर ,हर मोड़ पर मानो मुस्कुराता हुआ मिल जाएगा वो ,
बार-बार उसे पुकारती गुजरती जा रही हूँ ,

माँ की आँख का तारा था वो मेरे सूत से बंधा था वो ,
जाने कैसे गाँठ खुल गई कि  आज तक नहीं समझ पा रही हूँ में,


बीते लम्हों को याद कर फिर मुस्कुराने की कोशिश कर रही हूँ ,
कि अपने दामन में फिर सितारे समेटने की कोशिश कर रही हूँ ,

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

जिंदगी  दर्द के सहरा से  गुजरती  रही तनहा-तनहा ;
साँस  दर साँस उम्र घटती रही यूँ ही  तनहा-तनहा :
हंस  कर गुजर जाती तो अच्छा होता ,ग़म  तो ये है ;
कि  हर रत शबनम तरबतर करती रही तनहा-तनहा :
मैंने  काटी  है सजा किसी और के गुनाहों की ,तब भी गिला नहीं ;
 जो मिला हंस कर लिया ,माना कि ,
समय कम था जिंदगी के पास  जितना था हंस कर गुजर गया तनहा-तनहा :
हर  तस्वीर बिगड़ती  गई   सुखनवर बनूँ इस कोशिश में ,
तमाम उम्र  इक ख़ुशी के इन्जार में ,,
अश्क तमाम दामन में समेटे खत्म हो गई तनहा-तनहा 

सोमवार, 4 जून 2012

आदरणीय ब्लॉगर साथियों ,
                     मैंने अपने ब्लॉग का नाम परिवर्तित किया है अब आप इसे" विविधा" के नाम से जानेंगे और "मुख्य URL  है www .pramey 1.blogspot.com "  आप सभी आमंत्रित हैं मेरे ब्लॉग पर पोस्ट की समीक्षा हेतु। 
                                                                                                                                      सादर संगीता 

रविवार, 3 जून 2012

है लगाव जिंदगी से सभी को ,
है ख़याल हुस्न का सभी को;
सुलग रहा है अलाव इश्क का धड़कनों में आज भी ;
यही तो पहचान है जिन्दा होने की दिल की अभी भी ::::::::::::::::::;;


वो चित्रकार आज भी मसरूफ है ज़माने की फ़िक्र में ;
अब भी उकेर रहा है जिंदगी ;
रंगीं कर रहा है जमीं के कैनवास पर ;
मानो की जता रहा हो की गम गुजर जाया करते हैं बीत जाया नहीं करते::::::::::::::::::::::::::::;;;;;;;


मौत कभी जिस्म को आया नहीं करती ,
 धडकनों के थमने से अरमाँ नहीं मरा करते ;
 माना कि  लब खामोश हैं सभी के अभी ;
पर यूँ ही एलान मरा नहीं करते :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::


लहू बहा और जम गया जंग के मैदान में फिर भी ;
वह गलियों में,बाजारों में उतर आया है नारा बनकर;
शोला सा दहका है सर उठाया है हमने फिर अभी ;
ये वो जुनूँ  है जो संगीनों से डरा नहीं करते:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::;  
                                                                                                                           

बुधवार, 23 मई 2012

आदरणीय ब्लोगर साथियों ,
         में अभी भी अपनी समस्या से छुटकारा नहीं पा सकी हूँ ,गूगल सर्च के माध्यम से में अपने ब्लॉग के अनुवाद पृष्ठ पर पहुंचती हूँ तथा वहाँ  signin  कर डेशबोर्ड  पर फिर वहाँ  से  पोस्टिंग पर बस इतना ही कर सक रही हूँ ,अपने ब्लॉग पर या आप के ब्लॉग पर टिपण्णी करने में  अभी भी असमर्थ हूँ । सभी प्रयास कर चुकी हूँ ,कोई भी प्रयास सार्थक नहीं हुआ ,क्या इस समस्या का कोई हल है?
                                                        सादर 

मेरा मन

जीवन में उत्सवों के रंग भरता ;मेरे जीवंत होने को प्रमाणित करता ,
थमा देता है साहस की लाठी मेरे हाथ ;
ये मेरा मन मुझे कभी हारने नहीं देता ..........
गुजारी हुई यादों की तस्वीरें ,आने वाले कल के  सपने,काल
समय सदा ही उकेरता रहता है मेरे अन्तर्मन में ;
ये मेरा मन मुझे अभी मायूस नहीं होने देता .......................
जीवन के आरोहों-अवरोहों में ,खो जाते हैं विचार जिन्दगी के शोर में ;
समेट लेता है मुझे अपने आगोश में , ये मन मेरा मुझे कभी एकाकी नहीं होने देता.....................
यादों के गलियारों से गुजरते हुए ,गुजरे हुए हादसों को अध्याय सा सहेजते हुए ;
अनुभवों की नींव से फिर निर्माण करता ;
मेरा मन मुझे सहलाता और संवारता रहता है....................
नियति के सधे हुए  क्रम में ,निर्माण और निर्वाण के काल क्रम में ,
जब मिटने लगतीं हैं पानी में लिखी इबारतें,
तब हौसला देता मेरा ये मन मुझे कभी बिखरने नहीं देता ..................
जीवन में उत्सवों के रंग भरता मेरा ये मन मेरे जीवंत होने को प्रमाणित करता,
मेरा मन मुझे कभी हरने नहीं देता ....................
                                                     सादर 

सोमवार, 21 मई 2012

अभी तक में अपने ब्लॉग पर क्लिक नहीं कर सकी हूँ ,व्यक्तिगत तिपानी नहीं कर सक रही हूँ ।सदा की बीते हुए लम्हों के गुजरने की व्यथा,शास्त्रीजी ,की सुन्दर रचना ,यादों पर भावों के मधुर संयोजन,मेरी धरोहर पर सार्थक   अभिव्यक्ति ,जीवन के गलियारों में स्वयं को तलाशती भाव की सुदर प्रस्तुति ,नीम निम्बोरी पर सामयिक सार्थक चिंतन ,रेत  के महल पर शिल्पाजी की प्रतीक्षा रहेगी ,मधुर गुंजन पर मधुजी का जीवन की आप धापी से कुछ पल अपने लिए चुराने का प्रयास ,संध्या शर्मा जी द्वारा समयिक पोस्ट,ललित शर्मा जी का सार्थक मनोहारी चित्रण,नई पुरानी  हलचल पर यशवंत माथुर जी ले शानदार लिनक्स,अनुपमाजी    द्वारा जीवन की भावपूर्ण व्याख्या ,राजेश कुमारी द्वारा रचना में समय के कुठाराघात तथा समाज की विक्रितीयों की संवेदनशील पोस्ट,experssion पर सुन्दर कविता,तथा काव्य संसार पर संवेदनशील रचना ,
आप सभी की रचनाओं से में प्रभावित हूँ तथा आप सभी का आभर कि आपके लेखन के हर पक्ष से मेरा परिचय हो रहा है ।अच्छा फिर मिलेंगे...................
अपने लिए पलों को चुराने का 

शुक्रवार, 18 मई 2012

आप सभी की रचनाएँ बहुत अच्छी हैं और सारगर्भित हैं ,क्षमा करें व्यक्तिगत आपके  ब्लॉग पर पहुंच कर टिपण्णी करने में असमर्थ हूँ|

गुरुवार, 17 मई 2012

ब्लॉग तक पहुँचने का प्रयास जारी है । अभी तक असफल हूँ ।
सादर ।

बुधवार, 16 मई 2012

सभी ब्लोगर  मित्रों को सादर अभिवादन ,
              आज मुझे आप सभी के सुझाव और मार्गदर्शन  की आवश्यकता है । में विगत तीन दिनों से ब्लोगिंग नहीं कर सक रहीं हूँ , कारण मैं  किसी भी खोज engine द्वारा अपने ब्लॉग को खोज सकने में असमर्थ  हूँ ,गूगल द्वारा अपने डेशबोर्ड पर आप सभी की post  पढ़ सकती हूँ पर टिपण्णी नहीं कर सक रही हूँ ,इसी तरह अपनी  रचना पोस्ट कर सक रही हूँ पर उसे  मुखपृष्ठ पर नहीं देख सक रही हूँ ।आप सभी के मार्गदर्शन की आवश्यकता है । 
                                                                   

Tu Jahan Jahan Chalega - Lata Mangeshkar

शुक्रवार, 11 मई 2012

माँ

                         माँ तुझे सलाम
१ ).  शरद  सी  शुभ   चंद्रिका    शुभ्र  ज्योत्त्सना   ममतामयी::::::::::::
निरभ्र   व्योम   सी   शांत   ,हे   माँ   सदा  ही  पूजानीय :::::::::::
पुष्प   के  पराग  सी   सूर्य   की   उजास   सी ::::::::::::::::::::
चित्रकार   की   तूलिका   सी    नित   नव   कल्पनामयी :::::::::::::::
देवत्त्व   भी    आराधन    करें   दानवों    की    श्रद्धामयी ::::::
 हे   "माँ "    सदा   ही    वन्दनीय    तू   "माँ  " सदा   ही    पूजनीय :::


                                         (२ )  


  अब भी संजोये  रक्खे  हैं मैंने हथेली पर वे लम्हें;
  जब उंगली थामें तुम मेरे क़दमों के साथ चला करतीं थीं ::::::
  मेरे आंसुओं के छंद तुम्हारी हंसी की सरगम में ढल जाया करते थे:: मेरे सपनों की ताल पर तुम अपनी जिन्दगी की सूरत बदल लिया  करतीं थीं :::::::::
कई बार झटके हैं  हाथ मैने ,फिर भी सलामत रक्खे हैं वे लम्हें::::::::::::::::::::::
मुझमें कई बार अपना बचपन तलाशते पाया है तुम्हें :::::::::::::::::::::
अपना वजूद खुद में समेटे हमारी दुनिया के आँगन में::::::::::::::::::::
भुला कर सभी सपने अपने खो जातीं हमारे जीवन उत्सव में:::::::::::::;;;
मेरे हौसलों की उड़ानों में ,मेरी जिन्दगी  की हर लय में :::::
मेरे जीवन के गुजरते सारे आरोहों-अवरोहों के ::::::::::::::::::::::::::
तुम्हारे पूजन ,अर्चन  की ही छाया  तले   हँसते हुए  लम्हें :::::::::::
तन्हाइयों  में भी कभी तनहा होने देते नहीं :::::::::::;;; 
तुम्हारी ममता की खुशबू से सराबोर लम्हें  ::::::::::::::::;;
सदा ही सहेजे रक्खेंगे हम प्यार में भीगे ये  अमोल लम्हें::::::::::::::::::::