- गहन वेदना त्याग तपस्या एवम अनगिनत आहुतियों पश्चात् आजादी का जन्म हुआ,,
- जयघोष का आल्हादित और प्रफुल्लित नारों से आसमान गूंज उठा ,
- आज उम्र है पैंसठ की और गाथा क्या कहूँ,
- अनुभवों की झुर्रियों में छिपी है छले जाने की पीड़ा,
- रोज सुबह का सूरज मेरे सोये मन में नई आशा जगा जाता है ,
- पंछी के कलरव गीत नए बन जाते हैं ,पर .......
- भूखा बचपन, बिकती कन्या ,और सिसकती तरुणाई है ,
- ये कैसी है नई सुबह, और ये कैसी संचार है :::::::::
- वर्तमान के विकट स्वरूप में दुराचार की आंधी है,,
- शास्वत मूल्यों की तिलांजलि है , नेताओं की चांदी है:::::::::
शुक्रवार, 2 नवंबर 2012
त्रासदी आजादी की
शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012
हाँ भोर हो गई
क्षितिज के झरोंखो से किरणों के झांकते ही फज़ा रोशन हुई ,
रास्ते मुस्कुराने लगे ,रवि ने समेट ली नर्म कोहरे की चादर ,
दरख्तों के जवां हौसले बुलंद होने को हैं ;
पक्षियों के गीत आँगन मे गूंजने लगे
रहत की रहस्यमय चरमराहट से खेत भी गुनगुनाते है ;
ओस का आँचल ढलका रोशनी के हजार दिए खिलखिला उठे ;
हाँ भोर हो गई : लो भोर हो गई
रास्ते मुस्कुराने लगे ,रवि ने समेट ली नर्म कोहरे की चादर ,
दरख्तों के जवां हौसले बुलंद होने को हैं ;
पक्षियों के गीत आँगन मे गूंजने लगे
रहत की रहस्यमय चरमराहट से खेत भी गुनगुनाते है ;
ओस का आँचल ढलका रोशनी के हजार दिए खिलखिला उठे ;
हाँ भोर हो गई : लो भोर हो गई
रविवार, 21 अक्टूबर 2012
विविधा के साथ "जिंदगी का सफ़र "
जिंदगी की हर अदा से यूँ तो मैं वाकिफ नहीं हूँ ;फिर भी जिंदगी मुझसे और में जिंदगी से अजनबी नहीं हूँ::::::::
इस सफ़र के मीलों फासले तय कर लिए मैंने ;जिंदगी हासिल हो जहाँ वो मुकाम हासिल नहीं हैं ;
"मैं और तुम में" हमने बाँट लिया इसे ;मगर जिंदगी ने इसे कभी कबूला ही नहीं है :::::::::::::::::::::::;
इसने दुनिया के तजर्बों की शक्ल में जो भी दिया है ,मुझे;
उसमें उम्मीदों की झलक ख़्वाबों की शहनाई भी है ;
बोझल से मुस्तकबिल की रोशनी भी है ;
कबूला है मैंने हर शक्ल में इसे ,पर लौटाया कुछ भी नहीं है ::::::::::::::::::
तमाम उम्र वो राहें मेरे ज़ेहन में घुमती रहेंगी ;
जिन राहों से मायूसी से तो कभी उम्मीदों से गुजर की है;
अपनी खुशियों को और अपने ग़मों को तक़दीर से बाँध रक्खा है ;
मानो कभी जिंदगी के फ़लसफ़े को समझा ही नहीं है::::::::::::::::::::::::::::
जिंदगी की हर अदा से यूँ तो में वाकिफ नहीं हूँ ;फिर भी जिदगी मुझसे और में जिन्दगी मुझसे अजनबी नहीं हूँ
"संगीता "
इस सफ़र के मीलों फासले तय कर लिए मैंने ;जिंदगी हासिल हो जहाँ वो मुकाम हासिल नहीं हैं ;
"मैं और तुम में" हमने बाँट लिया इसे ;मगर जिंदगी ने इसे कभी कबूला ही नहीं है :::::::::::::::::::::::;
इसने दुनिया के तजर्बों की शक्ल में जो भी दिया है ,मुझे;
उसमें उम्मीदों की झलक ख़्वाबों की शहनाई भी है ;
बोझल से मुस्तकबिल की रोशनी भी है ;
कबूला है मैंने हर शक्ल में इसे ,पर लौटाया कुछ भी नहीं है ::::::::::::::::::
तमाम उम्र वो राहें मेरे ज़ेहन में घुमती रहेंगी ;
जिन राहों से मायूसी से तो कभी उम्मीदों से गुजर की है;
अपनी खुशियों को और अपने ग़मों को तक़दीर से बाँध रक्खा है ;
मानो कभी जिंदगी के फ़लसफ़े को समझा ही नहीं है::::::::::::::::::::::::::::
जिंदगी की हर अदा से यूँ तो में वाकिफ नहीं हूँ ;फिर भी जिदगी मुझसे और में जिन्दगी मुझसे अजनबी नहीं हूँ
"संगीता "
बुधवार, 10 अक्टूबर 2012
मैं और खुदा
उम्र भर अश्क पीने की ये सजा क्यूँ है ??
लहरों की हलचल में छिपा है दरिया का दर्द
हर लहर से पूछ साहिल से पूछ आबे-खां से पूछ ::::::::::::::
बार-बार बात-बात पर मुझे झकझोरता क्यूँ हैं ?
चलने का हौसला ही नहीं है तो दूरी का ग़म सताता है ;
कदम दर कदम मंजिल का पता पूछता क्यूँ है ?
महफूज था दर्द मेरे सीने में जो गुजर गया सो गुजर गया ;
फिर उसकी याद रह-रह कर दिलाता क्यूँ है ?
शनिवार, 29 सितंबर 2012
बीते लम्हों को याद कर फिर मुस्कुराने की कोशिश कर रही हूँ ,
कि अपने दामन में फिर सितारे समेटने की कोशिश कर रही हूँ ,
किसी अपने के खो जाने से यह दुनिया नहीं रुका करती है ,
यही अपने दिल को समझाने की कोशिश कर रही हूँ ,
घर के तमाम कोनों में बिखरा पड़ा है वजूद उसका ,
फिर भी जाने कहाँ-कहाँ ढूंढने की कोशिश किये जा रही हूँ ,
हर रहगुजर ,हर मोड़ पर मानो मुस्कुराता हुआ मिल जाएगा वो ,
बार-बार उसे पुकारती गुजरती जा रही हूँ ,
माँ की आँख का तारा था वो मेरे सूत से बंधा था वो ,
बीते लम्हों को याद कर फिर मुस्कुराने की कोशिश कर रही हूँ ,
कि अपने दामन में फिर सितारे समेटने की कोशिश कर रही हूँ ,
कि अपने दामन में फिर सितारे समेटने की कोशिश कर रही हूँ ,
किसी अपने के खो जाने से यह दुनिया नहीं रुका करती है ,
यही अपने दिल को समझाने की कोशिश कर रही हूँ ,
घर के तमाम कोनों में बिखरा पड़ा है वजूद उसका ,
फिर भी जाने कहाँ-कहाँ ढूंढने की कोशिश किये जा रही हूँ ,
हर रहगुजर ,हर मोड़ पर मानो मुस्कुराता हुआ मिल जाएगा वो ,
बार-बार उसे पुकारती गुजरती जा रही हूँ ,
माँ की आँख का तारा था वो मेरे सूत से बंधा था वो ,
जाने कैसे गाँठ खुल गई कि आज तक नहीं समझ पा रही हूँ में,
बीते लम्हों को याद कर फिर मुस्कुराने की कोशिश कर रही हूँ ,
कि अपने दामन में फिर सितारे समेटने की कोशिश कर रही हूँ ,
गुरुवार, 13 सितंबर 2012
जिंदगी दर्द के सहरा से गुजरती रही तनहा-तनहा ;
साँस दर साँस उम्र घटती रही यूँ ही तनहा-तनहा :
हंस कर गुजर जाती तो अच्छा होता ,ग़म तो ये है ;
कि हर रत शबनम तरबतर करती रही तनहा-तनहा :
मैंने काटी है सजा किसी और के गुनाहों की ,तब भी गिला नहीं ;
जो मिला हंस कर लिया ,माना कि ,
जो मिला हंस कर लिया ,माना कि ,
समय कम था जिंदगी के पास जितना था हंस कर गुजर गया तनहा-तनहा :
हर तस्वीर बिगड़ती गई सुखनवर बनूँ इस कोशिश में ,
तमाम उम्र इक ख़ुशी के इन्जार में ,,
अश्क तमाम दामन में समेटे खत्म हो गई तनहा-तनहा
सोमवार, 4 जून 2012
रविवार, 3 जून 2012
है लगाव जिंदगी से सभी को ,
है ख़याल हुस्न का सभी को;
सुलग रहा है अलाव इश्क का धड़कनों में आज भी ;
यही तो पहचान है जिन्दा होने की दिल की अभी भी ::::::::::::::::::;;
वो चित्रकार आज भी मसरूफ है ज़माने की फ़िक्र में ;
अब भी उकेर रहा है जिंदगी ;
रंगीं कर रहा है जमीं के कैनवास पर ;
मानो की जता रहा हो की गम गुजर जाया करते हैं बीत जाया नहीं करते::::::::::::::::::::::::::::;;;;;;;
मौत कभी जिस्म को आया नहीं करती ,
धडकनों के थमने से अरमाँ नहीं मरा करते ;
माना कि लब खामोश हैं सभी के अभी ;
पर यूँ ही एलान मरा नहीं करते :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
लहू बहा और जम गया जंग के मैदान में फिर भी ;
वह गलियों में,बाजारों में उतर आया है नारा बनकर;
शोला सा दहका है सर उठाया है हमने फिर अभी ;
ये वो जुनूँ है जो संगीनों से डरा नहीं करते:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::;
बुधवार, 23 मई 2012
आदरणीय ब्लोगर साथियों ,
में अभी भी अपनी समस्या से छुटकारा नहीं पा सकी हूँ ,गूगल सर्च के माध्यम से में अपने ब्लॉग के अनुवाद पृष्ठ पर पहुंचती हूँ तथा वहाँ signin कर डेशबोर्ड पर फिर वहाँ से पोस्टिंग पर बस इतना ही कर सक रही हूँ ,अपने ब्लॉग पर या आप के ब्लॉग पर टिपण्णी करने में अभी भी असमर्थ हूँ । सभी प्रयास कर चुकी हूँ ,कोई भी प्रयास सार्थक नहीं हुआ ,क्या इस समस्या का कोई हल है?
सादर
मेरा मन
थमा देता है साहस की लाठी मेरे हाथ ;
ये मेरा मन मुझे कभी हारने नहीं देता ..........
गुजारी हुई यादों की तस्वीरें ,आने वाले कल के सपने,काल
समय सदा ही उकेरता रहता है मेरे अन्तर्मन में ;
ये मेरा मन मुझे अभी मायूस नहीं होने देता .......................
जीवन के आरोहों-अवरोहों में ,खो जाते हैं विचार जिन्दगी के शोर में ;
समेट लेता है मुझे अपने आगोश में , ये मन मेरा मुझे कभी एकाकी नहीं होने देता.....................
यादों के गलियारों से गुजरते हुए ,गुजरे हुए हादसों को अध्याय सा सहेजते हुए ;
अनुभवों की नींव से फिर निर्माण करता ;
मेरा मन मुझे सहलाता और संवारता रहता है....................
नियति के सधे हुए क्रम में ,निर्माण और निर्वाण के काल क्रम में ,
जब मिटने लगतीं हैं पानी में लिखी इबारतें,
तब हौसला देता मेरा ये मन मुझे कभी बिखरने नहीं देता ..................
जीवन में उत्सवों के रंग भरता मेरा ये मन मेरे जीवंत होने को प्रमाणित करता,
मेरा मन मुझे कभी हरने नहीं देता ....................
सादर
सोमवार, 21 मई 2012
अभी तक में अपने ब्लॉग पर क्लिक नहीं कर सकी हूँ ,व्यक्तिगत तिपानी नहीं कर सक रही हूँ ।सदा की बीते हुए लम्हों के गुजरने की व्यथा,शास्त्रीजी ,की सुन्दर रचना ,यादों पर भावों के मधुर संयोजन,मेरी धरोहर पर सार्थक अभिव्यक्ति ,जीवन के गलियारों में स्वयं को तलाशती भाव की सुदर प्रस्तुति ,नीम निम्बोरी पर सामयिक सार्थक चिंतन ,रेत के महल पर शिल्पाजी की प्रतीक्षा रहेगी ,मधुर गुंजन पर मधुजी का जीवन की आप धापी से कुछ पल अपने लिए चुराने का प्रयास ,संध्या शर्मा जी द्वारा समयिक पोस्ट,ललित शर्मा जी का सार्थक मनोहारी चित्रण,नई पुरानी हलचल पर यशवंत माथुर जी ले शानदार लिनक्स,अनुपमाजी द्वारा जीवन की भावपूर्ण व्याख्या ,राजेश कुमारी द्वारा रचना में समय के कुठाराघात तथा समाज की विक्रितीयों की संवेदनशील पोस्ट,experssion पर सुन्दर कविता,तथा काव्य संसार पर संवेदनशील रचना ,
आप सभी की रचनाओं से में प्रभावित हूँ तथा आप सभी का आभर कि आपके लेखन के हर पक्ष से मेरा परिचय हो रहा है ।अच्छा फिर मिलेंगे...................
अपने लिए पलों को चुराने का
शुक्रवार, 18 मई 2012
बुधवार, 16 मई 2012
सभी ब्लोगर मित्रों को सादर अभिवादन ,
आज मुझे आप सभी के सुझाव और मार्गदर्शन की आवश्यकता है । में विगत तीन दिनों से ब्लोगिंग नहीं कर सक रहीं हूँ , कारण मैं किसी भी खोज engine द्वारा अपने ब्लॉग को खोज सकने में असमर्थ हूँ ,गूगल द्वारा अपने डेशबोर्ड पर आप सभी की post पढ़ सकती हूँ पर टिपण्णी नहीं कर सक रही हूँ ,इसी तरह अपनी रचना पोस्ट कर सक रही हूँ पर उसे मुखपृष्ठ पर नहीं देख सक रही हूँ ।आप सभी के मार्गदर्शन की आवश्यकता है ।
शुक्रवार, 11 मई 2012
माँ
माँ तुझे सलाम
१ ). शरद सी शुभ चंद्रिका शुभ्र ज्योत्त्सना ममतामयी::::::::::::
निरभ्र व्योम सी शांत ,हे माँ सदा ही पूजानीय :::::::::::
पुष्प के पराग सी सूर्य की उजास सी ::::::::::::::::::::
चित्रकार की तूलिका सी नित नव कल्पनामयी :::::::::::::::
देवत्त्व भी आराधन करें दानवों की श्रद्धामयी ::::::
हे "माँ " सदा ही वन्दनीय तू "माँ " सदा ही पूजनीय :::
(२ )
१ ). शरद सी शुभ चंद्रिका शुभ्र ज्योत्त्सना ममतामयी::::::::::::
निरभ्र व्योम सी शांत ,हे माँ सदा ही पूजानीय :::::::::::
पुष्प के पराग सी सूर्य की उजास सी ::::::::::::::::::::
चित्रकार की तूलिका सी नित नव कल्पनामयी :::::::::::::::
देवत्त्व भी आराधन करें दानवों की श्रद्धामयी ::::::
हे "माँ " सदा ही वन्दनीय तू "माँ " सदा ही पूजनीय :::
(२ )
अब भी संजोये रक्खे हैं मैंने हथेली पर वे लम्हें;
जब उंगली थामें तुम मेरे क़दमों के साथ चला करतीं थीं ::::::
मेरे आंसुओं के छंद तुम्हारी हंसी की सरगम में ढल जाया करते थे:: मेरे सपनों की ताल पर तुम अपनी जिन्दगी की सूरत बदल लिया करतीं थीं :::::::::
कई बार झटके हैं हाथ मैने ,फिर भी सलामत रक्खे हैं वे लम्हें::::::::::::::::::::::
मुझमें कई बार अपना बचपन तलाशते पाया है तुम्हें :::::::::::::::::::::
अपना वजूद खुद में समेटे हमारी दुनिया के आँगन में::::::::::::::::::::
भुला कर सभी सपने अपने खो जातीं हमारे जीवन उत्सव में:::::::::::::;;;
मेरे हौसलों की उड़ानों में ,मेरी जिन्दगी की हर लय में :::::
मेरे जीवन के गुजरते सारे आरोहों-अवरोहों के ::::::::::::::::::::::::::
तुम्हारे पूजन ,अर्चन की ही छाया तले हँसते हुए लम्हें :::::::::::
तन्हाइयों में भी कभी तनहा होने देते नहीं :::::::::::;;;
तुम्हारी ममता की खुशबू से सराबोर लम्हें ::::::::::::::::;;
सदा ही सहेजे रक्खेंगे हम प्यार में भीगे ये अमोल लम्हें::::::::::::::::::::
बुधवार, 9 मई 2012
हमारा आज
थक चुके क़दमों से नहीं चला जाता मंजिल की ओर,
नहीं गाया जाता अब जीवन का वैभव गान ..........
भूल चुके अब मनस्थ राग विराग ;
सपनों का जाल अब और नहीं बुना जाता ...
तारों के प्रतिबिम्बा में नहीं खोज पाती अब अपनों को ;
मूक हुआ ह्रदय संगीत ,राग हो चले सभी मौन ;
थक चुके क़दमों से नहीं चला जाता मंजिल की ओर;
बुधवार, 2 मई 2012
जननी तुझे कहाँ पाऊं अब
कभी निराशा ने जब घेरा नेह अनुपम बरसाया तूने ,
नहीं जानती तुझ बिन जननी कैसे पंथ चलूं एकाकी ,
तुझसे स्वर्ग रिझाना सीखा मन की तान सुनाना सीखा ;
मेरी जननी तेरे ये सुर इस दामन में ऐसे भर लूँ ;
देखूं जो दुखियारे मन को बस तेरा में अनुसरण कर लूँ .......................
सुखों की याद आंसू ले आती दुःख दिल को भारी कर जाता ;
माना मैंने जननी मेरा नाता तुझसे बस इतना ही था ;
देस पराये जाना मेरा ये तेरा संकल्प ही था ,
इन यादों के बंधन से कैसे खुद को आजाद करूँ में .
कभी निराशा ने जब घेरा नेह अनुपम बरसाया तूने,
सुन उर की व्याकुल धड़कन तुम मेरा हर विषाद हर लेतीं,
जग के तापों की झुलसन में भी शीतल एहसास करातीं ,
नेत्र प्रतीक्षा में आतुर हों मेरा पंथ निहारा करतीं ,
देवत्व की सी छाया तुम ,क्या में तुझ जैसी बन पाई ?
कौन बताये ............................................................
कभी निराशा ने जब घेरा नेह अनुपम बरसाया तूने ,
नहीं जानती तुझ बिन जननी पंथ चलूँ कैसे एकाकी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बुधवार, 25 अप्रैल 2012
आदत तन्हाई की
अब नहीं बर्दाश्त कोई खलल मुझे ,की अब तनहाइयों की आदत हो गई है.;
गुलों की नरमी से भी परहेज है मुझको ,काँटों की चुभन की आदत हो चली है.
तकदीर के आगे अब पेश नहीं होना है मुझे ;जिंदगी ने तदबीरों से दोस्ती जो कर ली है .....
साहिल पर आकर पलटते देखा हैं सकीना हरदम;छोड़ दिया साहिल ही मैने;
मझधारों की लहरों के साथ चलते-चलते ;हिचकोलों से मोहब्बत हो चली है....
कोई साथ अब यकीं नहीं दिला सकता मुझे ;रातों को ख़्वाबों से किनारा कर दिया मैने;
बेमानी रिश्तों से महरूम होने की शिकायत ही नहीं है मुझे ;
अजनबी राहों से मोहब्बत हो गई है मुझे.........
तबस्सुम के भेस में अश्कों के कारवां को सहेजे अंजुमन संवारते रहे हैं ;
कि रात , टूटे हुए सितारों से दामन सजाने का हुनर सिखा गई है मुझे
गुरुवार, 19 अप्रैल 2012
जीवन स्वप्न
मन की गहराई से मैंने उर की मादकता को माना,
जीवन तपता मरुथल सा मैंने यह अब जाना .................
मानों दरख्त जीवन के सूख चले मुरझा चले हैं,
बहती हुई नदी की सतह पर ही रहीं हूँ में अब जाना.....
स्वप्न संवर कर भी न संवर सके ,
जीवन को पुकार कर भी न पुकार सके ;
अनमनी सी दिशाओं में बहती रही हवाओं की मानिंद ,
डूबते उतराते किनारों पर ठहर सकना मुश्किल है अब जाना .............
दर्द मौन हो चला अजेय धैर्य ने ही थाम रखा है मुझे,
सांसो की डोर ने उम्र को बांध रखा है जैसे ,
रीते हुए पंथ के एकाकी सफ़र में झोकों की तरह बहना है मुझे,
जीवन के स्वप्नों का जाल कितना उलझ गया है अब जाना,
मन की गहराई से मैंने उर की मादकता को माना ...........................







