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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

तन्हाई

 नयनों का ये सूनापन, थका हुआ तन एकाकी मन ,
          ये ही तो अवलंबन है मेरे एकाकी जीवन धन ....
 जग के भुज बंधन में मैंने देखे अगणित रिश्ते मन के ,
       जीवन के निर्माण पंथ के साथी मेरे थे जो बिछड़े ..
इस जीवन को श्राप कहूँ या समझूँ तप का वरदान  
      नयनों का ये सूनापन ..................................
टूटे सपनों की बस्ती में मिटती अपनी हस्ती देखी,
  उल्लाह्स खोजती जीवन में ,संवेदना सदा घुटती देखी ..
रिश्तों की जब उष्ण तपिश है ,फिर भी क्यूँ दे रही है सिहरन 
      नयनों का ये सूनापन ,थका हुआ तन अवसादी मन .....
सांसों की नाजुक डोर से रिश्ते सदा सहेजे मैंने 
       कर्तव्यों की बेदी पर स्वप्न सदा बिखेरे मैंने .
पंथ निर्जन है अब मेरा ,मन एकाकी ढूँढ रहा है,
         खो गए ,मेरे पल थे जो उनको शायद ढूंढ़ रहा है 
नयनों के इस सूनेपन से ,करती हूँ उनका में वन्दन ..........
नयनों का ये सूनापन  थका हुआ तन एकाकी मन ........